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| डॉ. अंबेडकर अस्पताल में फेफड़े की जटिल सर्जरी की उपलब्धि। |
इन 13 मरीजों में सबसे कम उम्र 15 साल और सबसे अधिक उम्र 70 साल है। 15 वर्षीय बच्चे के बाएं फेफड़े के ऊपरी हिस्से में एस्परजिलोमा नाम का फंगस संक्रमण था, जिससे फेफड़े का वह हिस्सा खराब हो गया था। डॉक्टरों ने सर्जरी कर खराब हिस्से को निकाल दिया। विभाग के अनुसार, यह अस्पताल में लोबेक्टॉमी कराने वाला अब तक का सबसे कम उम्र का मरीज है।
दो मरीजों की इमरजेंसी में हुई सर्जरी
13 मरीजों में दो की स्थिति ऐसी थी कि उन्हें इमरजेंसी में सर्जरी की आवश्यकता पड़ी। दोनों मरीजों को खांसी के साथ काफी अधिक मात्रा में खून निकल रहा था, जिसे मेडिकल भाषा में हेमोप्टाइसिस कहा जाता है। स्थिति गंभीर होने पर डॉक्टरों ने तत्काल ऑपरेशन किया।
इन सभी सर्जरी में एडवांस लंग स्टेपलर का इस्तेमाल किया गया। डॉक्टरों के मुताबिक, इससे ऑपरेशन के बाद होने वाली कुछ गंभीर जटिलताओं का खतरा कम करने में मदद मिलती है। विभाग का कहना है कि इतने कम समय में बड़ी संख्या में लोबेक्टॉमी सर्जरी होना अस्पताल के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
क्या होती है लोबेक्टॉमी ?
मानव शरीर में दो फेफड़े होते हैं। दाएं फेफड़े में तीन और बाएं फेफड़े में दो लोब होते हैं। जब किसी बीमारी के कारण फेफड़े का कोई एक हिस्सा गंभीर रूप से खराब हो जाता है और बीमारी उसी हिस्से तक सीमित रहती है, तो डॉक्टर उस खराब हिस्से को सर्जरी के जरिए निकाल सकते हैं। इस प्रक्रिया को लोबेक्टॉमी कहा जाता है।
सर्जरी के दौरान छाती में चीरा लगाकर प्रभावित लोब को बाकी फेफड़े से अलग किया जाता है। इसके बाद लंग स्टेपलर जैसे विशेष उपकरण की मदद से खराब हिस्से को बाहर निकाला जाता है। सामान्य तौर पर ऑपरेशन के 6 से 8 दिन बाद मरीज को अस्पताल से छुट्टी दी जाती है।
टीबी के बाद फेफड़े में हो सकता है एस्परजिलोमा
डॉक्टरों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में फेफड़े की लोबेक्टॉमी की प्रमुख वजहों में एस्परजिलोमा और ब्रोन्किएक्टेसिस शामिल हैं। एस्परजिलोमा एक प्रकार का फंगस संक्रमण है, जो अक्सर ऐसे लोगों के फेफड़ों में हो सकता है जिन्हें पहले टीबी हो चुकी हो या जिनकी रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो। इसके कारण फेफड़े से खून आने की समस्या भी हो सकती है।
ब्रोन्किएक्टेसिस की स्थिति में फेफड़ों की सांस की नलियां खराब होकर चौड़ी हो जाती हैं। इससे बार-बार संक्रमण हो सकता है और खांसी के साथ खून भी आ सकता है।
इसके अलावा फेफड़े में पस का बड़ा हिस्सा बनना, खून की नसों की बनावट में गड़बड़ी और फेफड़े का कैंसर भी खांसी या बलगम में खून आने की वजह बन सकते हैं।
शुरुआती फेफड़े के कैंसर में भी होती है लोबेक्टॉमी
फेफड़े का कैंसर यदि शुरुआती स्टेज में हो और बीमारी केवल एक लोब तक सीमित हो, तो उस हिस्से को सर्जरी के जरिए निकालने की कोशिश की जा सकती है। ऐसे मामलों में लोबेक्टॉमी की जाती है, ताकि बीमारी से मरीज को पूरी तरह ठीक करने का प्रयास किया जा सके।
साल में सामान्य तौर पर 15 से 20 लोबेक्टॉमी
डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मृति अस्पताल का हार्ट, चेस्ट और वैस्कुलर सर्जरी विभाग छत्तीसगढ़ में फेफड़ों की सर्जरी के लिए जाना जाता है। यहां लोबेक्टॉमी के अलावा डिकॉर्टिकेशन, सेगमेंटेक्टॉमी और न्यूमोनेक्टॉमी जैसी सर्जरी भी की जाती हैं।
न्यूमोनेक्टॉमी में एक तरफ का पूरा फेफड़ा निकालना पड़ता है। अस्पताल में सामान्य तौर पर एक साल में करीब 15 से 20 लोबेक्टॉमी सर्जरी होती हैं, लेकिन इस बार सिर्फ दो महीने में ही 13 सर्जरी की जा चुकी हैं।
दूसरे राज्यों से भी इलाज के लिए पहुंचते हैं मरीज
फेफड़े की सर्जरी के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश से भी मरीज अस्पताल पहुंचते हैं।
विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू के अनुसार, कम अवधि में इतनी बड़ी संख्या में लोबेक्टॉमी सर्जरी होना विभाग के लिए बड़ी उपलब्धि है। उनका कहना है कि इन सर्जरी से मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के साथ छत्तीसगढ़ में फेफड़ों की जटिल सर्जरी की सुविधा को भी मजबूती मिली है।
आयुष्मान योजना के तहत निशुल्क सर्जरी
अस्पताल में इन सर्जरी को आयुष्मान योजना के तहत निशुल्क किया जा रहा है। विभाग में फिलहाल कुछ मरीज लोबेक्टॉमी सर्जरी के लिए इंतजार कर रहे हैं।
