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| दुर्ग नगर निगम में स्थायी कमिश्नर की नियुक्ति का इंतजार जारी। |
स्थायी कमिश्नर की नियुक्ति नहीं होने के कारण फिलहाल नगर निगम का पूरा प्रशासनिक कामकाज प्रभारी व्यवस्था के तहत संचालित किया जा रहा है। सबसे ज्यादा चर्चा वित्तीय अधिकारों को लेकर हो रही है। निगम से जुड़े सूत्रों का कहना है कि प्रभारी अधिकारी के पास पूर्ण वित्तीय अधिकार नहीं होने की वजह से कुछ महत्वपूर्ण वित्तीय फैसले और भुगतान से जुड़े मामलों पर असर पड़ सकता है।
बताया जा रहा है कि निर्माण और विकास कार्यों से संबंधित कई भुगतान फाइलें लंबित हैं। भुगतान में देरी की वजह से कुछ ठेकेदारों ने निर्माण और मेंटेनेंस कार्यों की रफ्तार धीमी कर दी है। हालांकि, कितने कार्य प्रभावित हुए हैं और कितनी राशि का भुगतान लंबित है, इसे लेकर अब तक कोई आधिकारिक जानकारी जारी नहीं की गई है।
पूर्व कमिश्नर सुमित अग्रवाल का 9 जुलाई को रायपुर तबादला किया गया था। इसके बाद 13 जुलाई को उपायुक्त मोहेंद्र साहू को नगर निगम कमिश्नर का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। तभी से निगम का संचालन प्रभारी व्यवस्था के तहत किया जा रहा है। अब स्थायी कमिश्नर की नियुक्ति में हो रही देरी प्रशासनिक कामकाज के साथ-साथ शहर की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गई है।
राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, निगम कमिश्नर की नियुक्ति को लेकर सत्ता से जुड़े अलग-अलग प्रभावशाली पक्षों की अपनी-अपनी पसंद बताई जा रही है। कई अधिकारियों के नाम संभावित दावेदारों के रूप में सामने आने की बातें भी कही जा रही हैं। हालांकि, इनमें से किसी भी नाम की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
दुर्ग नगर निगम की राजनीति में मंत्री गजेंद्र यादव और महापौर अल्का बाघमार के बीच राजनीतिक मतभेदों की चर्चाएं पहले भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में कमिश्नर की नियुक्ति में हो रही देरी को भी राजनीतिक हलकों में इन कथित मतभेदों से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा यह भी है कि दोनों पक्ष अपनी पसंद के अधिकारी को निगम की जिम्मेदारी सौंपे जाने के पक्ष में हो सकते हैं। हालांकि, यह केवल राजनीतिक चर्चा है और इसकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
कमिश्नर की नियुक्ति को लेकर जारी चर्चाओं के बीच यह आशंका भी जताई जा रही है कि इसका असर निगम के नियमित कामकाज पर पड़ सकता है। विकास कार्यों की स्वीकृति, भुगतान और अन्य प्रशासनिक निर्णयों के लिए स्थायी नेतृत्व की जरूरत महसूस की जा रही है।
इधर, निगम कर्मचारियों के बीच आगामी वेतन भुगतान को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, वेतन भुगतान में किसी तरह की वास्तविक बाधा होने की पुष्टि निगम प्रशासन ने नहीं की है। इसके बावजूद कर्मचारियों के बीच वित्तीय अधिकारों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी होने की बात कही जा रही है।
कमिश्नर की खाली कुर्सी को लेकर जारी राजनीतिक चर्चाओं के बीच अब यह सवाल भी उठ रहा है कि नियुक्ति में हो रही देरी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है या फिर इसके पीछे राजनीतिक सहमति का इंतजार किया जा रहा है। नगर निगम की कमिश्नर कुर्सी को शहर के प्रशासनिक फैसलों और विकास कार्यों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि जब तक प्रभावशाली राजनीतिक पक्ष किसी एक नाम पर सहमत नहीं होते, तब तक नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ने में समय लग सकता है। हालांकि, शासन स्तर पर नियुक्ति में देरी का कोई आधिकारिक कारण सामने नहीं आया है।
फिलहाल नगर निगम के कर्मचारी, ठेकेदार और शहर की जनता नए कमिश्नर की नियुक्ति का इंतजार कर रही है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि पहले प्रशासनिक फैसला होता है या फिर राजनीतिक सहमति बनने के बाद नियुक्ति की घोषणा की जाती है।
